भू पर्यवेक्षण

  भारतीय सुदूर संवेदन कार्यक्रम प्रयोक्‍ताओं की आवश्‍यकताओं के अनुरूप संचालित होता है।  वस्‍तुत:, पहला सुदूर संवेदन आधारित कार्यक्रम वर्षों पहले 1970 में  नारियल पेड़ों की जड़ें सूखने की बीमारी को चिह्नित करने के लिए चलाया गया था।  विभिन्न उपग्रह आंकड़े अनुप्रयोगों में  देशी व विदेशी प्रयोक्‍ताओं की ज़रूरत के अनुसार विभिन्‍न आकाशीय, स्‍पेक्‍ट्रमी एवं कालिक विभेदनों में आंकड़ों को उपलब्‍ध कराने के लिए के लिए आईआरएस उपग्रहों में कई प्रकार के उपकरण लगाए जाते हैं।

आईआरएस उपग्रह हमारी पृथ्‍वी पर अंतरिक्ष से नज़र रखते हैं तथा भूमि, महासागर, वायुमंडल तथा पर्यावरण संबंधित कई पहलुओं के विषय में कालिक, सारिक तथा व्‍यवस्थित सूचनाएं उपलब्‍ध कराते हैं।  ये सूचनाऍं केन्‍द्र व राज्‍य सरकारों को भोजन तथा जल सुरक्षा, पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी प्रणाली, मौसम व जलवायु की समझ, प्राकृतिक संसाधनों के मानीटरन व प्रबंधन तथा विकास क्रियाकलापों का नियोजन व मानीटरन, आपदाओं की रोकथाम व प्रबंधन सहायक तथा सुशासन के लिए ज़रूरी होती हैं।

विभिन्‍न क्षेत्रों में संचालित अनुप्रयोग परियोजनाएं

 

कृषि एवं मृदा

 

  • कृषि उत्‍पादन आकलन
  • क्षारीय/सोडिक मृदाओं का मानचित्रण
  • कृषि-मौसमवैज्ञा‍निक सेवाएं एवं आपदाओं की निगरानी (नाशक कीड़े, बाढ़, सूखा)
  • बागवानी विकास

 

जैव संसाधन एवं पर्यावरण 

 

  • वन आवरण तथा वन प्रकार का मानचित्रण
  • आर्द-भूमि मानचित्रण व संरक्षण योजनाएं
  • जैव विविधता लक्षणन
  • मरुस्‍थलीकरण स्थिति का मानचित्रण
  • तटीय, कच्छीय वनस्‍पति, प्रवाल संबंधित अध्ययन
  • हिम एवं हिमनद अध्‍ययन

 

 


मानचित्र कला

 

  • बृहत् पैमाने पर मानचित्रण
  • उपग्रह आधारित स्‍थलाकृतिक मानचित्रों को अद्यतन बनाना
  • डिजिटल तुंगता मॉडल (कार्टो-डीईएम) निर्माण
  • खसरा स्‍तर पर मानचित्रण  

 

भू-विज्ञान एवं खनिज संसाधन 

 

  • भू स्‍खलन के खतरेवाले क्षेत्रों का सीमांकन
  • खनिज/तेल की खोज, खनन क्षेत्र अध्ययन
  • भूकंप-विर्वतनिक अध्‍ययन
  • अभियंत्रिकी तथा भू-पर्यावरणीय अध्‍ययन

 


महासागर एवं मौसमविज्ञान

 

  • महासागरीय प्राथमिक उत्‍पदकता अध्ययन
  • महासागर स्थिति का पूर्वानुमान
  • चक्रवात प्रवाह का प्रतिरूपण (मॉडलिंग)
  • क्षेत्रीय मौसम का पूर्वानुमान
  • भू-मध्‍य रेखीय चक्रवात तथा मध्‍य मापक्रम (मेसोस्केल) अध्‍ययन
  • मानसून का विस्‍तृत परिसर पूर्वानुमान

 

ग्रामीण विकास

 

  • राष्‍ट्रीय पेय जल मिशन
  • बंजर भूमि मानचित्रण/अद्यतनीकरण
  • जलसंभर विकास व मानीटरन
  • भूमि अभिलेख अधुनिकीकरण योजना

 


शहरी विकास

 

  • प्रमुख शहरों का नगर अव्‍यवस्थित विस्‍तार मानचित्रण
  • मास्‍टर/संरचनात्‍मक योजनाएं
  • चयनित शहरों के लिए व्‍यापक विकास योजनाएं
  • शहरों के आधार मानचित्रों का निर्माण
  • राष्‍ट्रीय शहरी सूचना प्रणाली 

 

जल संसाधन  

 

  • सिंचाई संबंधित बुनियादी संरचनाओं का मूल्‍यांकन
  • जल संसाधन सूचना प्रणाली
  • हिमगलन प्रवाह आकलन
  • जलाशय क्षमता मूल्‍यांकन
  • जलविद्युत परियोजनाओं के लिए उपयुक्त स्‍थान का चयन

 


प्राकृतिक संसाधन गणना

 

  • प्राकृतिक संसाधन गणना कार्यक्रम के अंतर्गत प्राकृतिक संसाधनों का कालिक सूचीकरण
  • भूमि उपयोग/भूमि आवरण, मृदा, भू-रूपाकृति, आर्दभूमि, भूमि विकृतिकरण, हिम एवं हिमनद, वनस्‍पतिक अध्ययन

 

आपदा प्रबंधन सहायता

 

  • बाढ़, चक्रवात, सूखा, भू-स्‍खलन, भूकंप, तथा दावानल संबंधी कार्य
  • पूर्व चेतावनी प्रणाली तथा निर्णय उपादान संबंधित अनुसंधान एवं विकास 

 


जलवायु परिवर्तन अध्‍ययन

 

  • सूचकों का मानचित्रण, कारकों का मानिटरन तथा प्रभाव का प्रतिरूपण
  • जलवायु प्राचलों का चित्रांकन
  • मीथेन उत्‍सर्जन एवं वृक्ष-सीमा (टिंबरलाइन) अध्‍ययन 

 


हमारे देश में राष्‍ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली (एनएनआरएमएस) की सुस्‍थापित बहुविध क्रियान्‍वयन व्‍यवस्‍था के तहत सुदूर संवेदन तथा  भू-आकाशीय प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा कई राष्‍ट्रीय, क्षेत्रीय व स्‍थानीय परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। इसरो/अंतरिक्ष विभाग के दो प्रमुख केन्‍द्र, नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी) तथा अंतरिक्ष उपयोग केन्‍द्र (सैक) ऐसे अनुपयोगों के विकास व क्रियान्‍वयन में पहल व नेतृत्‍व कर रहे हैं।

एनआरएससी के क्षेत्रीय सुदूर संवेदन केन्‍द्र (आरआरएससी), उत्‍तर पूर्वी अंतरिक्ष उपयोग केन्‍द्र (एनई-सैक), शिलांग तथा राज्‍यों के सुदूर संवेदन अनुप्रयोग केन्‍द्र, स्‍थानीय आवश्‍यकताओं को संबोधित करने के लिए इस तकनीक के प्रभावी उपयोग में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  राज्‍य तथा केन्‍द्र सरकार के प्रयोक्‍ता मंत्रालय व अन्‍य संस्‍थान भी एनएनआरएमएस प्रणाली द्वारा अपने-अपने विभागों में इस तकनीक के इस्‍तेमाल में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा देश के विभिन्‍न विकास क्षेत्रों में इस तकनीक के इस्‍तेमाल को बढ़ावा देने में निजी क्षेत्र, गैर सरकारी संगठनों तथा शैक्षिक जगत की भी अहम भूमिका है।